Arshad Ali Khan Qalaq's Photo'

अरशद अली ख़ान क़लक़

1820 - 1879 | लखनऊ, भारत

अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के प्रमुख दरबारी और आफ़ताबुद्दौला शम्स-ए-जंग के ख़िताब से सम्मानित शायर

अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के प्रमुख दरबारी और आफ़ताबुद्दौला शम्स-ए-जंग के ख़िताब से सम्मानित शायर

ग़ज़ल 51

शेर 73

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

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अपने बेगाने से अब मुझ को शिकायत रही

दुश्मनी कर के मिरे दोस्त ने मारा मुझ को

बे-ख़ुदी-ए-दिल मुझे ये भी ख़बर नहीं

किस दिन बहार आई मैं दीवाना कब हुआ

पुस्तकें 4

Gulzar-e-Ejaz

 

1987

Intikhab-e-Qalaq

 

1983

Khwaja Arshad Ali Khan Qalaq Lakhnavi : Hayat Aur Karname

 

1994

Masnavi-e- Qalq

Tilism-e-Ulfat

1927

 

चित्र शायरी 1

था क़स्द-ए-क़त्ल-ए-ग़ैर मगर मैं तलब हुआ जल्लाद मेहरबान हुआ क्या सबब हुआ अफ़सोस कुछ न मेरी रिहाई का ढब हुआ छूटा उधर क़फ़स से इधर मैं तलब हुआ तशरीफ़ लाए आप जो मैं जाँ-ब-लब हुआ उस वक़्त के भी आने का मुझ को अजब हुआ निकलेगी अब न हसरत-ए-क़त्ल ऐ निगाह-ए-यास क़ातिल को रहम आ गया मुझ पर ग़ज़ब हुआ हो जाएगा कुछ और ही रंग अहल-ए-हश्र का क़ातिल से ख़ूँ-बहा जो हमारा तलब हुआ शायद बढाईं यार ने मन्नत की बेड़ियाँ अब की मुझे जुनूँ न हुआ क्या सबब हुआ पिन्हाँ तमाम ज़ुल्मत-ए-कुफ़्र-ओ-सितम हुई तालेअ' जूँही वो मेहर-ए-सिपहर-ए-अरब हुआ हम डूब जाएँगे अरक़-ए-इंफ़िआ'ल में आमाल-नामा हश्र में जिस दम तलब हुआ इतना तो जज़्ब-ए-दिल ने दिखाया मुझे असर चैन उस को भी न आया मैं बेताब जब हुआ रोते थे अक़्ल-ओ-होश ही को हम तो इश्क़ में लो अब तो दिल से सब्र भी रुख़्सत-तलब हुआ ऐ बे-ख़ुदी-ए-दिल मुझे ये भी ख़बर नहीं किस दिन बहार आई मैं दीवाना कब हुआ शादी शब-ए-विसाल की मातम हुई मुझे हंगाम-ए-सुब्ह-ए-यार जो रुख़्सत-तलब हुआ बोसे दिखा दिखा के हमें ले रहा है ये क्यूँ इतना बे-लिहाज़ तिरा ख़ाल-ए-लब हुआ क्या जान कर मलाल दिए कब का था ग़ुबार किस रोज़ आसमाँ से मैं राहत-तलब हुआ दुनिया में ऐ 'क़लक़' जो पुर-अरमान हम रहे नाशाद ना-मुराद हमारा लक़ब हुआ

 

ऑडियो 6

आश्ना होते ही उस इश्क़ ने मारा मुझ को

डोरा नहीं है सुरमे का चश्म-ए-सियाह में

था क़स्द-ए-क़त्ल-ए-ग़ैर मगर मैं तलब हुआ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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