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अरशद अली ख़ान क़लक़

1820 - 1879 | लखनऊ, भारत

अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के प्रमुख दरबारी और आफ़ताबुद्दौला शम्स-ए-जंग के ख़िताब से सम्मानित शायर

अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह के प्रमुख दरबारी और आफ़ताबुद्दौला शम्स-ए-जंग के ख़िताब से सम्मानित शायर

ग़ज़ल 50

शेर 73

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

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अपने बेगाने से अब मुझ को शिकायत रही

दुश्मनी कर के मिरे दोस्त ने मारा मुझ को

बे-ख़ुदी-ए-दिल मुझे ये भी ख़बर नहीं

किस दिन बहार आई मैं दीवाना कब हुआ

ई-पुस्तक 5

Gulzar-e-Ejaz

 

1987

Khwaja Arshad Ali Khan Qalaq Lakhnavi : Hayat Aur Karname

 

1994

 

ऑडियो 6

आश्ना होते ही उस इश्क़ ने मारा मुझ को

डोरा नहीं है सुरमे का चश्म-ए-सियाह में

था क़स्द-ए-क़त्ल-ए-ग़ैर मगर मैं तलब हुआ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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