आसिफ़ रज़ा
ग़ज़ल 7
नज़्म 18
अशआर 9
अजनबी मुझ से आ गले मिल ले
आज इक दोस्त याद आए मुझे
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ये दिल में वसवसा क्या पल रहा है
तिरा मिलना भी मुझ को खल रहा है
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जतन तो ख़ूब किए उस ने टालने के मगर
मैं उस की बज़्म से उस के जवाब तक न उठा
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तेरा मेरा है गुमाँ का रिश्ता
तू है मेरी तिरी ईजाद हूँ मैं
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भूल बैठा हूँ मैं ज़माने को
अब ज़माना भी भूल जाए मुझे
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