अज़ीज़ वारसी
ग़ज़ल 40
अशआर 13
दिल में अब कुछ भी नहीं उन की मोहब्बत के सिवा
सब फ़साने हैं हक़ीक़त में हक़ीक़त के सिवा
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कैसे मुमकिन है कि हम दोनों बिछड़ जाएँगे
इतनी गहराई से हर बात को सोचा न करो
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ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-हस्ती की क़सम
और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
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इक वक़्त था कि दिल को सुकूँ की तलाश थी
और अब ये आरज़ू है कि दर्द-ए-निहाँ रहे
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पुस्तकें 9
ऑडियो 7
उस ने मिरे मरने के लिए आज दुआ की
ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ
जहाँ में हम जिसे भी प्यार के क़ाबिल समझते हैं
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