ग़ज़ल 9

शेर 13

ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही

आदमी से आदमी बरहम रहा

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी

फिर भी फ़ानी दुनिया में जावेदाँ तो मैं भी हूँ जावेदाँ तो तुम भी हो

मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं

बहता रहता है तिरी याद का दरिया मुझ में

तू ख़ुश है अपनी दुनिया में

मैं तिरी याद में जलता हूँ

एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम

किस नगर की ख़ाक थे किस दश्त में ठहरे रहे