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बेदम शाह वारसी

1876 - 1936 | बाराबंकी, भारत

सूफ़ी शायर धार्मिक शायरी के लिए विख्यात

ग़ज़ल 47

शेर 18

वो क़ुलक़ुल-ए-मीना में चर्चे मिरी तौबा के

और शीशा-ओ-साग़र की मय-ख़ाने में सरगोशी

हमारी ज़िंदगी तो मुख़्तसर सी इक कहानी थी

भला हो मौत का जिस ने बना रक्खा है अफ़्साना

अपना तो ये मज़हब है काबा हो कि बुत-ख़ाना

जिस जा तुम्हें देखेंगे हम सर को झुका देंगे

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ई-पुस्तक 5

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1935

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1990

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1935

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1991

 

वीडियो 8

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