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बहज़ाद लखनवी

1900 - 1974 | कराची, पाकिस्तान

नात, ग़ज़ल और भजन के ख़ास रंगों के मशहूर शायर । उनकी मशहूर ग़ज़ल ' ए जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ ' को कई गायकों ने आवाज़ दी है

नात, ग़ज़ल और भजन के ख़ास रंगों के मशहूर शायर । उनकी मशहूर ग़ज़ल ' ए जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ ' को कई गायकों ने आवाज़ दी है

ग़ज़ल 20

शेर 9

वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहे हैं

मैं क्या कर रहा हूँ वो क्या कर रहे हैं

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आता है जो तूफ़ाँ आने दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है

मुमकिन है कि उठती लहरों में बहता हुआ साहिल जाए

जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल जाए

मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल जाए

हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते

तुम इधर भी निगाह कर लेते

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ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं

जलता हुआ दिया हूँ मगर रौशनी नहीं

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पुस्तकें 45

Aah-e-Natamam

 

 

Aah-e-Natamam

 

 

Asrar-e-America

 

1925

Bahram Ki Wapsi

 

 

Bahzad Lacknawi Ke Sau Geet

 

1940

Bayan-e-Huzoor

Manzoom Seerat-e-Rasool

1942

Bete Ka Qatil

 

1926

Bustan-e-Bahzad

 

 

Bustan-e-Bahzad

 

 

Charagh-e-Toor

 

1941

चित्र शायरी 1

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया हम ने तो आह कुफ़्र को ईमाँ बना लिया दिल की ख़लिश-पसंदियाँ हैं कि अल्लाह की पनाह तीर-ए-नज़र को जान-ए-रग-ए-जाँ बना लिया मुझ को ख़बर नहीं मिरे दिल को ख़बर नहीं किस की नज़र ने बंदा-ए-एहसाँ बना लिया महसूस कर के हम ने मोहब्बत का हर अलम ख़्वाब-ए-सुबुक को ख़्वाब-ए-परेशाँ बना लिया दस्त-ए-जुनूँ की उक़्दा-कुशाई तो देखिए दामन को बे-नियाज़ गरेबाँ बना लिया तस्कीन-ए-दिल की हम ने भी परवाह छोड़ दी हर मौज-ए-ग़म को हासिल-ए-तूफ़ाँ बना लिया जब उन का नाम आ गया हम मुज़्तरिब हुए आहों को अपनी ज़ीस्त का उनवाँ बना लिया हम ने तो अपने दिल में वो ग़म हो कि हो अलम जो कोई आ गया उसे मेहमाँ बना लिया आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई अपने को ख़ुद ही आप ने हैराँ बना लिया इक बे-वफ़ा पे कर के तसद्दुक़ दिल-ओ-जिगर 'बहज़ाद' हम ने ख़ुद को परेशाँ बना लिया

 

वीडियो 10

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

बहज़ाद लखनवी

बहज़ाद लखनवी

बहज़ाद लखनवी

बहज़ाद लखनवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

ऑडियो 5

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ

तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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