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भारतेंदु हरिश्चंद्र

1850 - 1885 | बनारस, भारत

हिंदी के नवीकरण के प्रचारक, क्लासिकी शैली में अपनी उर्दू ग़ज़ल के लिए प्रसिद्ध

हिंदी के नवीकरण के प्रचारक, क्लासिकी शैली में अपनी उर्दू ग़ज़ल के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 19

शेर 20

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के

रहा जहाँ में सिकंदर और जम बाक़ी

जाए दिल आप का भी और किसी पर

देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा

रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं

क़यामत है मुसाफ़िर रास्ता दिन को भटकते हैं

रुबाई 2

 

ई-पुस्तक 2

अज़ीम हिंदी दानिश्वर: भारतेंदु हरीश चन्द्र का उर्दू कलाम

 

2004

Hindustani Adab Ke Memar: Bharatendu Harishchandra

 

1984

 

चित्र शायरी 2

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा ऐ शोला-रुख़ो आग लगाना नहीं अच्छा किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ ये दाग़ कलेजे पे उठाना नहीं अच्छा आया है अयादत को मसीहा सर-ए-बालीं ऐ मर्ग ठहर जा अभी आना नहीं अच्छा सोने दे शब-ए-वस्ल-ए-ग़रीबाँ है अभी से ऐ मुर्ग़-ए-सहर शोर मचाना नहीं अच्छा तुम जाते हो क्या जान मिरी जाती है साहिब ऐ जान-ए-जहाँ आप का जाना नहीं अच्छा आ जा शब-ए-फ़ुर्क़त में क़सम तुम को ख़ुदा की ऐ मौत बस अब देर लगाना नहीं अच्छा पहुँचा दे सबा कूचा-ए-जानाँ में पस-ए-मर्ग जंगल में मिरी ख़ाक उड़ाना नहीं अच्छा आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा कर दूँगा अभी हश्र बपा देखियो जल्लाद धब्बा ये मिरे ख़ूँ का छुड़ाना नहीं अच्छा ऐ फ़ाख़्ता उस सर्व-ए-सही क़द का हूँ शैदा कू-कू की सदा मुझ को सुनाना नहीं अच्छा

 

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A Short Profile of Bhartendu Harishchandra

Bharatendu Harishchandra

Bharatendu Harishchandra - father of modern Hindi writers

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