बिलाल अहमद
ग़ज़ल 6
नज़्म 8
अशआर 9
अजीब क़ैद थी जिस में बहुत ख़ुशी थी मुझे
अब अश्क थमते नहीं हैं ये क्या रिहा हुआ मैं
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
हमारी ख़ाक तबर्रुक समझ के ले जाओ
हमारी जान मोहब्बत की लौ में जलती थी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
सुना है मैं ने अज़िय्यत मज़ा भी देती है
सुना है दिल की ख़लिश में सकूँ भी होता है
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
एक हालत थी मिरी और एक हालत दिल की थी
मेरी हालत तो वही है दिल की वो हालत गई
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
अजीब ढंग से तक़सीम-ए-कार की उस ने
सो जिस को दिल न दिया उस को दिलरुबाई दी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए