aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1901 - 1976 | टोंक, भारत
क्लासिकी अंदाज़ के प्रमुख शायर / सीमाब अकबराबादी के शागिर्द
हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर
लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं
सर जिस पे न झुक जाए उसे दर नहीं कहते
हर दर पे जो झुक जाए उसे सर नहीं कहते
किया तबाह तो दिल्ली ने भी बहुत 'बिस्मिल'
मगर ख़ुदा की क़सम लखनऊ ने लूट लिया
काबे में मुसलमान को कह देते हैं काफ़िर
बुत-ख़ाने में काफ़िर को भी काफ़र नहीं कहते
ख़ुश्बू को फैलने का बहुत शौक़ है मगर
मुमकिन नहीं हवाओं से रिश्ता किए बग़ैर
औराक़-ए-ज़िन्दगी
1971
Bismil Saeedi
Shakhs Aur Shayar
1976
Bismil Saeedi Apne Watan Mein
1966
Kaif-e-Alam
कैफ़-ए-अलम
1953
Kulliyat-e-Bismil Saeedi
2007
Mushahidat
1960
Nishat-e-Gham
1951
हम ने काँटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं
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