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बुशरा एजाज़

ग़ज़ल 4

 

नज़्म 6

शेर 5

मिरी अपनी और उस की आरज़ू में फ़र्क़ ये था

मुझे बस वो उसे सारा ज़माना चाहिए था

शब भी है वही हम भी वही तुम भी वही हो

है अब के मगर अपनी सज़ा और तरह की

अपने सारे रास्ते अंदर की जानिब मोड़ कर

मंज़िलों का इक निशाँ बाहर बनाना चाहिए

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