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बुशरा एजाज़

ग़ज़ल 4

 

नज़्म 6

शेर 5

मिरी अपनी और उस की आरज़ू में फ़र्क़ ये था

मुझे बस वो उसे सारा ज़माना चाहिए था

शब भी है वही हम भी वही तुम भी वही हो

है अब के मगर अपनी सज़ा और तरह की

अपने सारे रास्ते अंदर की जानिब मोड़ कर

मंज़िलों का इक निशाँ बाहर बनाना चाहिए

ऑडियो 4

محبت میں کوئی صدمہ اٹھانا چاہئے تھا

मिरी रात मेरा चराग़ मेरी किताब दे

उन्हें ढूँडो

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI