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फ़रहत अब्बास शाह

1964 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 17

शेर 4

उस के बारे में बहुत सोचता हूँ

मुझ से बिछड़ा तो किधर जाएगा

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से

तुम्हारा दर्द कई काम ले गया मुझ से

उसे ज़ियादा ज़रूरत थी घर बसाने की

वो के मेरे दर-ओ-बाम ले गया मुझ से

मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ

तो कुछ सहाब मिरे साथ साथ चलते हैं

पुस्तकें 1

आवारा मिज़ाज

 

 

 

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