ग़ज़ल 17

शेर 4

औरत हूँ मगर सूरत-ए-कोहसार खड़ी हूँ

इक सच के तहफ़्फ़ुज़ के लिए सब से लड़ी हूँ

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अल्फ़ाज़ आवाज़ हमराज़ दम-साज़

ये कैसे दोराहे पे मैं ख़ामोश खड़ी हूँ

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जिस बादल ने सुख बरसाया जिस छाँव में प्रीत मिली

आँखें खोल के देखा तो वो सब मौसम लम्हाती थे

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