फ़ौज़िया रबाब
ग़ज़ल 18
नज़्म 1
अशआर 17
देख सुक़रात ने बस ज़हर पिया था लेकिन
ज़िंदगी मैं तो तुझे घोल के पी जाऊँगी
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तुम्हारी याद है मातम-कुनाँ अभी मुझ में
तुम्हारा दर्द अभी तक सियह लिबास में है
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कुछ इस लिए भी मुझे कामयाबी मिलती है
मैं अपने बाबा के नक़्श-ए-क़दम पे चलती हूँ
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आज फिर तुम को हम ने देखा है
आज महशर बनी हैं ये आँखें
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मेरे ख़्वाबों में रोज़ आती हैं
अपनी आँखें सँभाल कर रखिए
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वीडियो 4
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