फ़ज़्ल लखनवी
ग़ज़ल 10
अशआर 3
दुनिया के भरे बाज़ारों में यूँ सुनता हूँ अपना अफ़्साना
जैसे कि ये मेरा ज़िक्र नहीं जैसे कि ये मेरा नाम नहीं
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आँखों के गुलाबी डोरों में इक कैफ़ सा पाया जाता है
मय-ख़्वार-ए-मोहब्बत होश में आ साक़ी की नज़र है जाम नहीं
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नज़रों में तसादुम दिल में चुभन इक शम्अ' है इक परवाना है
दोनों ही में बातें होती हैं आवाज़ का लेकिन नाम नहीं
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