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ग़ालिब अयाज़

1981 | दिल्ली, भारत

ग़ालिब अयाज़

ग़ज़ल 8

शेर 7

भले ही छाँव दे आसरा तो देता है

ये आरज़ू का शजर है ख़िज़ाँ-रसीदा सही

हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए

ये रेत जैसा बदन आँधियों के काम तो आए

तुम्हारे दर से उठाए गए मलाल नहीं

वहाँ तो छोड़ के आए हैं हम ग़ुबार अपना

तमाम उम्र उसे चाहना था मुमकिन

कभी कभी तो वो इस दिल पे बार बन के रहा

हम उस के जब्र का क़िस्सा तमाम चाहते हैं

और उस की तेग़ हमारा ज़वाल चाहती है

पुस्तकें 1

Dasht Mein Kaati Hui Ruten

 

 

 

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