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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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हफ़ीज़ बनारसी

1933 - 2008 | बनारस, भारत

हफ़ीज़ बनारसी

ग़ज़ल 28

नज़्म 1

 

अशआर 25

उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं

मेरा हो सका वो किसी का तो हो गया

गुमशुदगी ही अस्ल में यारो राह-नुमाई करती है

राह दिखाने वाले पहले बरसों राह भटकते हैं

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फूल अफ़्सुर्दा बुलबुलें ख़ामोश

फ़स्ल गुल आई है ख़िज़ाँ-बर-दोश

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मिले फ़ुर्सत तो सुन लेना किसी दिन

मिरा क़िस्सा निहायत मुख़्तसर है

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ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को

हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है

पुस्तकें 10

 

चित्र शायरी 4

 

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