noImage

हामिद सरोश

हामिद सरोश

ग़ज़ल 4

 

शेर 2

मैं ने भेजी थी गुलाबों की बशारत उस को

तोहफ़तन उस ने भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा भेजी है

कितने ग़म हैं जो सर-ए-शाम सुलग उठते हैं

चारा-गर तू ने ये किस दुख की दवा भेजी है