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इफ़्फ़त ज़र्रीं

1958 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 9

शेर 7

ज़ेहन दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे

एक ही घर में बहुत से अजनबी रहते रहे

वो मिल गया तो बिछड़ना पड़ेगा फिर 'ज़र्रीं'

इसी ख़याल से हम रास्ते बदलते रहे

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देख कर इंसान की बेचारगी

शाम से पहले परिंदे सो गए

पत्थर के जिस्म मोम के चेहरे धुआँ धुआँ

किस शहर में उड़ा के हवा ले गई मुझे

वो मुझ को भूल चुका अब यक़ीन है वर्ना

वफ़ा नहीं तो जफ़ाओं का सिलसिला रखता

पुस्तकें 7

Anfas-e-Ghazal

 

1992

Beesvin Sadi Mein Urdu Ghazal

 

2001

Be-Sahil Dariya

 

1998

Fort William College Ki Nasri Dastanein

Ek Tahzeebi Mutala

1992

लखनऊ का दबिस्तान-ए-नस्र

 

2000

Zarrin Nama

 

2014

 

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