इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल 44
अशआर 14
चश्म-ए-तर पर गर नहीं करता हवा पर रहम कर
दे ले साक़ी हम को मय ये अब्र-ए-बाराँ फिर कहाँ
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क्या बदन होगा कि जिस के खोलते जामे का बंद
बर्ग-ए-गुल की तरह हर नाख़ुन मोअत्तर हो गया
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मिस्र में हुस्न की वो गर्मी-ए-बाज़ार कहाँ
जिंस तो है पे ज़ुलेख़ा सा ख़रीदार कहाँ
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दोस्ती बद बला है इस में ख़ुदा
किसी दुश्मन को मुब्तला न करे
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