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इशरत धौलपुर

शेर 2

गुमनाम एक लाश कफ़न को तरस गई

काग़ज़ तमाम शहर के अख़बार बन गए

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कितना पुर-अम्न है माहौल फ़सादात के बा'द

शाम के वक़्त निकलता नहीं बाहर कोई

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