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इशरत क़ादरी

1926

ग़ज़ल 17

शेर 6

इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे

इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे

वो तेरे बिछड़ने का समाँ याद जब आया

बीते हुए लम्हों को सिसकते हुए देखा

कौन देखेगा मुझ में अब चेहरा

आईना था बिखर गया हूँ मैं

ज़ाहिरी शक्ल मेरी ज़िंदा है

और अंदर से मर गया हूँ मैं

यूँ ज़िंदगी गुज़र रही है मेरी

जो उन की है वही ख़ुशी है मेरी

पुस्तकें 7

Aasman Saiyban

 

2010

Fakhr-e-Hindustan

 

1995

Jashn-e-Yak Shab

 

 

Khwab To Jazeere Hain

 

2003

Naqsh-e-Wafa

 

1994

Sahar Numa

 

1984

Tare Pairahan

 

1962