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इशरत क़ादरी

1926

ग़ज़ल 17

शेर 6

इन अंधेरों से परे इस शब-ए-ग़म से आगे

इक नई सुब्ह भी है शाम-ए-अलम से आगे

वो तेरे बिछड़ने का समाँ याद जब आया

बीते हुए लम्हों को सिसकते हुए देखा

ज़ाहिरी शक्ल मेरी ज़िंदा है

और अंदर से मर गया हूँ मैं

ई-पुस्तक 3

Aasman Saiyban

 

2010

Fakhr-e-Hindustan

 

1995

Sahar Numa

 

1984

 

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