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इज़हार असर

1929 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 7

शेर 5

एक ही शय थी ब-अंदाज़-ए-दिगर माँगी थी

मैं ने बीनाई नहीं तुझ से नज़र माँगी थी

तमाम मज़हर-ए-फ़ितरत तिरे ग़ज़ल-ख़्वाँ हैं

ये चाँदनी भी तिरे जिस्म का क़सीदा है

उन से मिलने का मंज़र भी दिल-चस्प था 'असर'

इस तरफ़ से बहारें चलीं और उधर से खिज़ाएँ चलीं

ई-पुस्तक 6

Aaj Ki Science

 

2006

Basharat

 

1975

Lashareek

 

1988

Maut Ke Baad

 

2009

मौत के बाद

 

 

Ubharte Jauban

 

 

 

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