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जावेद लख़नवी

1862 - 1922 | लखनऊ, भारत

जावेद लख़नवी

ग़ज़ल 17

अशआर 14

कहीं ऐसा हो मर जाऊँ मैं हसरत ही हसरत में

जो लेना हो तो ले लो सब से पहले इम्तिहाँ मेरा

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शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे हैं

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तुम पास जो आए खो गए हम

जब तुम मिले तो जुस्तुजू की

तुम्हें है नश्शा जवानी का हम में ग़फ़लत-ए-इश्क़

इख़्तियार में तुम हो इख़्तियार में हम

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ये इक बोसे पे इतनी बहस ये ज़ेबा नहीं तुम को

नहीं है याद मुझ को ख़ैर अच्छा ले लिया होगा

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