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जावेद शाहीन

1922 - 2008 | लाहौर, पाकिस्तान

जावेद शाहीन के संपूर्ण

ग़ज़ल 56

शेर 14

जम्अ करती है मुझे रात बहुत मुश्किल से

सुब्ह को घर से निकलते ही बिखरने के लिए

कुछ ज़माने की रविश ने सख़्त मुझ को कर दिया

और कुछ बेदर्द मैं उस को भुलाने से हुआ

ख़ुद बना लेता हूँ मैं अपनी उदासी का सबब

ढूँड ही लेती है 'शाहीं' मुझ को वीरानी मिरी

मज़ा तो जब है उदासी की शाम हो 'शाहीं'

और उस के बीच से शाम-ए-तरब निकल आए

थोड़ा सा कहीं जम्अ भी रख दर्द का पानी

मौसम है कोई ख़ुश्क सा बरसात से आगे

पुस्तकें 6

Der Se Nikalne Wala Din

 

2004

Ek Deewarm Ki Doori

 

2000

Pakistani Adab-1993

Hissa-e-Sher

1994

Pakistani Adab-1994

Hissa-e-Sher

1994

Untalees Badhe Aadmi

 

1946

Zakhm-e-Musalsal Ki Hari Shakh

 

 

 

ऑडियो 12

अजनबी बूद-ओ-बाश के क़ुर्ब-ओ-जवार में मिला

अजब सी कोई बे-यक़ीं रात थी

इक जगह हूँ फिर वहाँ इक याद रह जाने के बाद

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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