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जिगर मुरादाबादी

1890 - 1960 | मुरादाबाद, भारत

सबसे प्रमुख पूर्वाधुनिक शायरों में शामिल अत्याधिक लोकप्रियता के लिए विख्यात

सबसे प्रमुख पूर्वाधुनिक शायरों में शामिल अत्याधिक लोकप्रियता के लिए विख्यात

ग़ज़ल

अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे

जिगर मुरादाबादी

अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे

नोमान शौक़

आदमी आदमी से मिलता है

नोमान शौक़

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है

फ़हद हुसैन

इश्क़ को बे-नक़ाब होना था

फ़हद हुसैन

इश्क़ को बे-नक़ाब होना था

नोमान शौक़

कभी शाख़ ओ सब्ज़ा ओ बर्ग पर कभी ग़ुंचा ओ गुल ओ ख़ार पर

नोमान शौक़

कसरत में भी वहदत का तमाशा नज़र आया

नोमान शौक़

जेहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए

नोमान शौक़

जान कर मिन-जुमला-ए-ख़सान-ए-मय-ख़ाना मुझे

नोमान शौक़

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद

जिगर मुरादाबादी

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद

नोमान शौक़

दिल को सुकून रूह को आराम आ गया

नोमान शौक़

दिल गया रौनक़-ए-हयात गई

नोमान शौक़

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

नोमान शौक़

नज़र मिला के मिरे पास आ के लूट लिया

नोमान शौक़

मोहब्बत सुल्ह भी पैकार भी है

नोमान शौक़

ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए

नोमान शौक़

राज़ जो सीना-ए-फ़ितरत में निहाँ होता है

नोमान शौक़

लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया

नोमान शौक़

वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना

नोमान शौक़

शब-ए-फ़िराक़ है और नींद आई जाती है

नोमान शौक़

हर हक़ीक़त को ब-अंदाज़-ए-तमाशा देखा

नोमान शौक़

अल्लाह रे इस गुलशन-ए-ईजाद का आलम

ख़ालिद मुबश्शिर

क्या बराबर का मोहब्बत में असर होता है

ख़ालिद मुबश्शिर

जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं

ख़ालिद मुबश्शिर

न देखा रुख़ बे-नक़ाब-ए-मोहब्बत

ख़ालिद मुबश्शिर

नक़ाब-ए-हुस्न-ए-दो-आलम उठाई जाती है

ख़ालिद मुबश्शिर

बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले

ख़ालिद मुबश्शिर

यादश-ब-ख़ैर जब वो तसव्वुर में आ गया

ख़ालिद मुबश्शिर

रखते हैं ख़िज़्र से न ग़रज़ रहनुमा से हम

ख़ालिद मुबश्शिर

शब-ए-वस्ल क्या मुख़्तसर हो गई

ख़ालिद मुबश्शिर

शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए

ख़ालिद मुबश्शिर

हुस्न के एहतिराम ने मारा

ख़ालिद मुबश्शिर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI