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जुरअत क़लंदर बख़्श

1748 - 1809 | लखनऊ, भारत

अपनी शायरी में महबूब के साथ मामला-बंदी के मज़मून के लिए मशहूर, नौजवानी में नेत्रहीन हो गए

अपनी शायरी में महबूब के साथ मामला-बंदी के मज़मून के लिए मशहूर, नौजवानी में नेत्रहीन हो गए

जुरअत क़लंदर बख़्श

ग़ज़ल 78

अशआर 131

इलाही क्या इलाक़ा है वो जब लेता है अंगड़ाई

मिरे सीने में सब ज़ख़्मों के टाँके टूट जाते हैं

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मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब

उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किए

कैफ़ियत महफ़िल-ए-ख़ूबाँ की उस बिन पूछो

उस को देखूँ तो फिर दे मुझे दिखलाई क्या

भरी जो हसरत-ओ-यास अपनी गुफ़्तुगू में है

ख़ुदा ही जाने कि बंदा किस आरज़ू में है

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लब-ए-ख़याल से उस लब का जो लिया बोसा

तो मुँह ही मुँह में अजब तरह का मज़ा आया

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क़ितआ 1

 

क़िस्सा 1

 

पुस्तकें 6

 

चित्र शायरी 3

 

ऑडियो 6

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

इतना बतला मुझे हरजाई हूँ मैं यार कि तू

ऐ दिला हम हुए पाबंद-ए-ग़म-ए-यार कि तू

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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