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कमाल अहमद सिद्दीक़ी

1926 - 2013 | दिल्ली, भारत

उरूज़ के विख्यात विशेषज्ञ और स्कॉलर।

उरूज़ के विख्यात विशेषज्ञ और स्कॉलर।

ग़ज़ल 7

शेर 6

कुछ लोग जो ख़ामोश हैं ये सोच रहे हैं

सच बोलेंगे जब सच के ज़रा दाम बढ़ेंगे

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एक दिल है कि उजड़ जाए तो बस्ता ही नहीं

एक बुत-ख़ाना है उजड़े तो हरम होता है

उस का तो एक लफ़्ज़ भी हम को नहीं है याद

कल रात एक शेर कहा था जो ख़्वाब में

पुर्सिश-ए-हाल भी इतनी कि मैं कुछ कह सकूँ

इस तकल्लुफ़ से करम हो तो सितम होता है

ज़िंदगी नाम इसी मौज-ए-मय-ए-नाब का है

मय-कदे से जो उठे दार-ओ-रसन तक पहुँचे

पुस्तकें 350

1949 Ka Behtareen Adab

 

1949

Aab-e-Gum

 

1990

Aable

 

1971

Aab-o-Hawa

 

1989

Aagahi

 

1996

Aaina Numa

 

2009

Aaina Numa

Shumara Number-003

2003

Aakhiri Raat

 

2011

Aanke Banke

 

1960

Abgina-e-Sahar

 

2001

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