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कँवल ज़ियाई

1927 - 2012

ग़ज़ल 8

शेर 4

हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं

हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है

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चंद साँसों के लिए बिकती नहीं ख़ुद्दारी

ज़िंदगी हाथ पे रक्खी है उठा कर ले जा

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हमारा दौर अंधेरों का दौर है लेकिन

हमारे दौर की मुट्ठी में आफ़्ताब भी है

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