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काविश बद्री

1927

ग़ज़ल 18

शेर 11

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया

जो हरारत थी मिरी उस के बदन में गई

अब वो अहबाब ज़िंदा हैं रस्म-उल-ख़त वहाँ

रूठ कर उर्दू तो देहली से दकन में गई

जवाब देने की मोहलत मिल सकी हम को

वो पल में लाख सवालात कर के जाता है

पुस्तकें 8

Kaviyam

Adab-ul-Aaliya

1977

Kawisham

 

2014

Kawiyam

 

 

Kunfayakun

 

2004

Masnavi-e-Qibla Numa

 

1965

Qadeem Tamil Nadu Mein Arabi Wa Farsi Adabiyat Ki Char Sau Sala Tareekh

Volume-001

2004

Sherdhanjali

 

1946