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ख़ालिद इबादी

1971 | पटना, भारत

पत्रकार, उत्तर-आधुनिक शायरों में सशक्त अभिव्यक्ति के लिए प्रख्यात

पत्रकार, उत्तर-आधुनिक शायरों में सशक्त अभिव्यक्ति के लिए प्रख्यात

ख़ालिद इबादी

ग़ज़ल 9

शेर 8

शहर का भी दस्तूर वही जंगल वाला

खोजने वाले ही अक्सर खो जाते हैं

कभी कभी चुप हो जाने की ख़्वाहिश होती है

ऐसे में जब तीर-ए-सितम की बारिश होती है

अभी मरने की जल्दी है 'इबादी'

अगर ज़िंदा रहे तो फिर मिलेंगे

हमारे हाथ काटे जा रहे थे

तुम्हारे हाथ से किरपान ले कर

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मैं ज़ख़्म ज़ख़्म नहीं हूँ मगर मसीहाई

मिरे बदन में मिरी जान क्यूँ नहीं रखती

पुस्तकें 2

ख़ुश अहजार

 

2006

Nahron Ka Jaal

 

1997

 

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