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ख़ालिद मुबश्शिर

1980 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 14

शेर 8

मुझे शक है होने होने पे 'ख़ालिद'

अगर हूँ तो अपना पता चाहता हूँ

मिरी वहशतों का सबब कौन समझे

कि मैं गुम-शुदा क़ाफ़िला चाहता हूँ

कहीं राँझा, कहीं मजनूँ हुआ

वजूद-ए-इश्क़ आलमगीर है

दश्त-ए-जुनूँ से गए शहर-ए-ख़िरद में हम

दिल को मगर ये सानेहा अच्छा नहीं लगा

टपक के दीदा-ए-नम से सदाएँ देता है

जो एक हर्फ़-ए-तमन्ना दिल-ए-तबाह में था

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