ख़ालिद यूसुफ़

ग़ज़ल 13

शेर 4

उसे ख़बर है कि अंजाम-ए-वस्ल क्या होगा

वो क़ुर्बतों की तपिश फ़ासले में रखती है

ये अदाएँ ये इशारे ये हसीं क़ौल-ओ-क़रार

कितने आदाब के पर्दे में है इंकार की बात

फ़न का दावा है तो कुछ जुरअत-ए-इज़हार भी हो

ज़ेब देता नहीं फ़नकार को बुज़दिल होना

हम ने माना कि तिरे शहर में सब अच्छा है

कोई ईसा हो तो मिल जाएँगे बीमार बहुत

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