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ख़्वाजा साजिद

1968 | नागपुर, भारत

ख़्वाजा साजिद

ग़ज़ल 10

अशआर 3

सारे जज़्बों के बाँध टूट गए

उस ने बस ये कहा इजाज़त है

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कल सियासत में भी मोहब्बत थी

अब मोहब्बत में भी सियासत है

कौन कितना ज़ब्त कर सकता है कर्ब-ए-हिज्र को

रेल जब चलने लगेगी फ़ैसला हो जाएगा

 

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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