aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
1968 | नौशेरा, पाकिस्तान
गर्दिश-ए-अय्याम से चलती है नब्ज़-ए-काएनात
वक़्त का पहिया रुका तो ज़िंदगी रुक जाएगी
ख़ुद अपने आप से रहता है आदमी नाराज़
उदासियों के भी अपने मिज़ाज होते हैं
मुझ से तो कोई ताज-महल भी न बन सका
बे-नाम दिल की क़ब्र में दफ़ना दिया तुझे
ताज़ा हवा ख़रीदने आते हैं गाँव में
'शाहिद' शहर के लोग भी कैसे अजीब हैं
बाँध के अहद-ए-वफ़ा लोग चले जाते हैं
छोड़ जाते हैं फ़क़त जिस्म की उलझी गाँठें
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