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महताब अालम

1972 | भोपाल, भारत

ग़ज़ल 8

शेर 14

दिल भी तोड़ा तो सलीक़े से तोड़ा तुम ने

बेवफ़ाई के भी आदाब हुआ करते हैं

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वतन को फूँक रहे हैं बहुत से अहल-ए-वतन

चराग़ घर के हैं सरगर्म घर जलाने में

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तुम ज़माने के हो हमारे सिवा

हम किसी के नहीं तुम्हारे हैं

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पुस्तकें 3

फ़िराक़ का ज़ाइज़ा

 

1995

Saba Rang Khushboo

 

2014

Wast-e-Hind Mein Urdu Adab

Volume-002

2012

 

चित्र शायरी 1

दिल भी तोड़ा तो सलीक़े से न तोड़ा तुम ने बेवफ़ाई के भी आदाब हुआ करते हैं

 

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