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Mahtab Haider Naqvi's Photo'

महताब हैदर नक़वी

1955 | अलीगढ़, भारत

जदीदियत के बाद की नस्ल के नुमाइंदा तरीन शायरों में शामिल, क्लासिकी तर्ज़-ए-बयान और अस्री हिस्सियत की तख़लीक़ी आमेज़िश के लिए मारूफ़

जदीदियत के बाद की नस्ल के नुमाइंदा तरीन शायरों में शामिल, क्लासिकी तर्ज़-ए-बयान और अस्री हिस्सियत की तख़लीक़ी आमेज़िश के लिए मारूफ़

महताब हैदर नक़वी

ग़ज़ल 33

अशआर 3

नए सफ़र की लज़्ज़तों से जिस्म जाँ को सर करो

सफ़र में होंगी बरकतें सफ़र करो सफ़र करो

एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ

कितनी दहलीज़ों पे सज्दा एक पेशानी करे

मतलब के लिए हैं मआनी के लिए हैं

ये शेर तबीअत की रवानी के लिए हैं

 

पुस्तकें 6

 

वीडियो 16

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ऑडियो 15

अगर कोई ख़लिश-ए-जावेदाँ सलामत है

अपनी ख़ातिर सितम ईजाद भी हम करते हैं

अब रहे या न रहे कोई मलाल-ए-दुनिया

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