Makhmoor Saeedi's Photo'

मख़मूर सईदी

1938 - 2010 | दिल्ली, भारत

प्रमुख आधुनिक शायर / पत्रिका तहरीक से संबंधित थे

प्रमुख आधुनिक शायर / पत्रिका तहरीक से संबंधित थे

ग़ज़ल 31

शेर 20

मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ

हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने

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बुतों को पूजने वालों को क्यूँ इल्ज़ाम देते हो

डरो उस से कि जिस ने उन को इस क़ाबिल बनाया है

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घर में रहा था कौन कि रुख़्सत करे हमें

चौखट को अलविदा'अ कहा और चल पड़े

कुछ यूँ लगता है तिरे साथ ही गुज़रा वो भी

हम ने जो वक़्त तिरे साथ गुज़ारा ही नहीं

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ग़म नशात की हर रहगुज़र में तन्हा हूँ

मुझे ख़बर है मैं अपने सफ़र में तन्हा हूँ

दोहा 6

साफ़ बता दे जो तू ने देखा है दिन रात

दुनिया के डर से रख दिल में दिल की बात

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डूबने वालों पर कसे दुनिया ने आवाज़े

साहिल से करती रही तूफ़ाँ के अंदाज़े

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कौन मुसाफ़िर कर सका मंज़िल का दीदार

पलक झपकते खो गए राहों के आसार

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तन्हा तू रह जाएगा कोई होगा साथ

जैसे ही ये लोग हैं पकड़ इन्ही का हाथ

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कुछ कहने तक सोच ले बद-गो इंसान

सुनते हैं दीवारों के भी होते हैं कान

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पुस्तकें 306

Aiwan-e-Urdu Ke Muntakhab Afsane

 

1995

Atthara Sau Sattawan Ki Kahani Mirza Ghalib Ki Zabani

 

2007

Auraq-e-Zindagi

 

1971

औराक़-ए-ज़िन्दगी

 

1971

Auraq-e-Zindagi

 

1971

अावाज़ का जिस्म

 

1972

Awaz Ka Jism

 

1972

Baazdeed

 

1989

Bans Ke Jangalon Se Guzarti Hawa

 

1983

Bismil Saeedi

Shakhs Aur Shayar

 

चित्र शायरी 5

नए नए लफ़्ज़ शोर करते बढ़े चले आ रहे हैं फ़िक्र ओ ख़याल की रहगुज़र आबाद हो रही है ज़बाँ बहुत सी पुरानी हद-बंदियों से आज़ाद हो रही है कई फ़साने जो अन-कहे थे कई तसव्वुर जो बे-ज़बाँ थे हज़ार आलम नशात ओ ग़म के जो पहले ना-क़ाबिल-ए-बयाँ थे वो धड़कनें ख़ामुशी ही जिन के ख़रोश-ए-पिन्हाँ की तर्जुमाँ थी वो नग़्मगी जो ख़मोशियों के सियाह ज़िंदाँ में पर-फ़िशाँ थी उसे अब आख़िर खुली फ़ज़ाओं में इज़्न-ए-परवाज़ मिल गया है कि इक नया रिश्ता दरमियान-ए-ख़याल-ओ-आवाज़ मिल गया है मगर मुझे चुप सी लग गई है नए नए लफ़्ज़ शोर करते बढ़े चले आ रहे हैं और मैं हुजूम-ए-पुर-शोर में अकेला पुराने लफ़्ज़ों को ढूँडता हूँ ये देखता हूँ जहाँ जहाँ कल पुराने लफ़्ज़ों ने डाल रक्खे थे अपने डेरे वहाँ नए लफ़्ज़ आ के आबाद हो गए हैं मकाँ अगरचे उजड़ न पाए मकीन बर्बाद हो गए हैं नए नए लफ़्ज़ शोर करते बढ़े चले आ रहे हैं लेकिन पुराने लफ़्ज़ों की पाएमाली ने दम ब-ख़ुद कर दिया है मुझ को किसी ने सोचा नहीं है शायद मगर मैं अक्सर ये सोचता हूँ पुराने लफ़्ज़ों के साथ ही इक पुरानी दुनिया भी खो गई है ख़ामोशियों के सियाह-ज़िंदाँ में जा के रू-पोश हो गई है

मैं उस के वादे का अब भी यक़ीन करता हूँ हज़ार बार जिसे आज़मा लिया मैं ने

कुछ यूँ लगता है तिरे साथ ही गुज़रा वो भी हम ने जो वक़्त तिरे साथ गुज़ारा ही नहीं

 

वीडियो 5

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
chal pade hain to kahiin ja ke thaharna hoga

मख़मूर सईदी

Laut kar apni taraf aa jaaun

मख़मूर सईदी

Reading his poetry

मख़मूर सईदी

Wo barf hoon main tuu mujhe chhoo le to pighal jaoon

मख़मूर सईदी

ऑडियो 12

कसक पुराने ज़माने की साथ लाया है

ग़म ओ नशात की हर रहगुज़र में तन्हा हूँ

जानिब-ए-कूचा-ओ-बाज़ार न देखा जाए

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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