Malikzaada Manzoor Ahmad's Photo'

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

1929 - 2016 | लखनऊ, भारत

उर्दू के प्रमुख साहित्यिक व्यक्तित्व/मुशायरों के स्तरीय संचालन के लिए प्रसिद्ध

उर्दू के प्रमुख साहित्यिक व्यक्तित्व/मुशायरों के स्तरीय संचालन के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 19

नज़्म 1

 

शेर 23

देखोगे तो हर मोड़ पे मिल जाएँगी लाशें

ढूँडोगे तो इस शहर में क़ातिल मिलेगा

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चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है

जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है

ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से जोड़ा जाए

आईना है इसे पत्थर से तोड़ा जाए

पुस्तकें 16

Ghubar-e-Khatir Ka Tanqeedi Mutala

 

1971

Intikhab Ghazaliyat Nazeer Akbarabadi

 

1983

Intikhab-e-Ghazliyat-e-Nazeer Akbarabadi

 

1994

Maulana Abul Kalam Aazad Fikr-o-Fan

 

2007

Maulana Abul Kalam Azad Al-Hilal Ke Aa.ina Mein

 

1972

Maulana Abul Kalam Azad Fikr-o-Fun

 

1969

Raqs-e-Sharar

 

2004

Shahr-e-Adab

 

2011

Shahr-e-Sitam

 

 

शहर-ए-सितम

 

1992

चित्र शायरी 1

चेहरे पे सारे शहर के गर्द-ए-मलाल है जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है उलझन घुटन हिरास तपिश कर्ब इंतिशार वो भीड़ है के साँस भी लेना मुहाल है आवारगी का हक़ है हवाओं को शहर में घर से चराग़ ले के निकलना मुहाल है बे-चेहरगी की भीड़ में गुम है हर इक वजूद आईना पूछता है कहाँ ख़द्द-ओ-ख़ाल है जिन में ये वस्फ़ हो कि छुपा लें हर एक दाग़ उन आइनों की आज बड़ी देख-भाल है परछाइयाँ क़दों से भी आगे निकल गईं सूरज के डूब जाने का अब एहतिमाल है कश्कोल-ए-चश्म ले के फिरो तुम न दर-ब-दर 'मंज़ूर' क़हत-ए-जिंस-ए-वफ़ा का ये साल है

 

वीडियो 7

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
khuda kare ke jo aaye hamare baad wo log hamare fan ki

Malikzada Manzoor Ahmed Born on 17th Oct,1929, in Bhidhunpur, Malikzada Manzoor showed his literary talent at an early age. He acquired PG degree in Urdu & English and later did Ph.D in Urdu literature. He is extremely good at recitation and has recited many ghazals/nazams at mushairas and such other literary functions. Malikzada Manzoor retired as professor, department of Urdu, Lucknow University. He is the author of several books and had also worked as an editor 'Imkaan" (monthly Urdu literary Journal from Lucknow). मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

ज़िंदगी में पहले इतनी तो परेशानी न थी

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

न ख़ौफ़-ए-बर्क़ न ख़ौफ़-ए-शरर लगे है मुझे

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

मामूल पे साहिल रहता है फ़ितरत पे समुंदर होता है

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

ऑडियो 6

कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम

ज़िंदगी में पहले इतनी तो परेशानी न थी

तर्क-ए-मोहब्बत अपनी ख़ता हो ऐसा भी हो सकता है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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