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मंज़ूर हाशमी

1935 - 2026 | अलीगढ़, भारत

मंज़ूर हाशमी

ग़ज़ल 21

अशआर 29

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

क़ुबूल कैसे करूँ उन का फ़ैसला कि ये लोग

मिरे ख़िलाफ़ ही मेरा बयान माँगते हैं

सुना है सच्ची हो नीयत तो राह खुलती है

चलो सफ़र करें कम से कम इरादा करें

कभी कभी तो किसी अजनबी के मिलने पर

बहुत पुराना कोई सिलसिला निकलता है

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इक ज़माना है हवाओं की तरफ़

मैं चराग़ों की तरफ़ हो जाऊँ

पुस्तकें 10

 

चित्र शायरी 1

 

वीडियो 3

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Reading some sher at a mushaira

मंज़ूर हाशमी

wo teer chhoda hua to usi kamaan ka tha

मंज़ूर हाशमी

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