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मंज़ूर हाशमी

1935 - 2008 | अलीगढ़, भारत

ग़ज़ल 18

शेर 27

क़ुबूल कैसे करूँ उन का फ़ैसला कि ये लोग

मिरे ख़िलाफ़ ही मेरा बयान माँगते हैं

यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी ले कर चराग़ जलता है

सुना है सच्ची हो नीयत तो राह खुलती है

चलो सफ़र करें कम से कम इरादा करें

पुस्तकें 4

Aab

 

1994

Barish

 

1981

बारिश

 

1981

Daire

Shumara Number-003

1986

 

चित्र शायरी 1

कभी कभी तो किसी अजनबी के मिलने पर बहुत पुराना कोई सिलसिला निकलता है

 

वीडियो 3

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
At a mushaira

मंज़ूर हाशमी

Reading some sher at a mushaira

मंज़ूर हाशमी

wo teer chhoda hua to usi kamaan ka tha

मंज़ूर हाशमी

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