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मरग़ूब अली

1952 - | नजीबाबाद, भारत

ग़ज़ल 14

शेर 11

रात पड़ते ही हर इक रोज़ उभर आती है

किस के रोने की सदा ज़ात के सन्नाटे में

हमें तो याद बहुत आया मौसम-ए-गुल में

वो सुर्ख़ फूल सा चेहरा खिला हुआ अब के

ऐसा हो कि ताज़ा हवा अजनबी लगे

कमरे का एक-आध दरीचा खुला भी रख

ई-पुस्तक 4

Aadhi Raat Ki Shabnam

 

2001

Faiz Ahmad Faiz: Ahwal-o-Afkar

 

2013

Meera Ji Ki Nazmein

 

1990

Safar Kahani

 

2007

 

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