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मशकूर हुसैन याद

1925 - 2017 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 6

शेर 8

बेहतर है कि अब ख़ुद से जुदा हो के भी देखें

दरिया में तो दरिया का हवाला नहीं मिलता

नक़ाब उठाओ तो हर शय को पाओगे सालिम

ये काएनात ब-तौर-ए-हिजाब टूटती है

आँसू आँसू जिस ने दरिया पार किए

क़तरा क़तरा आब में उलझा बैठा है

पुस्तकें 8

Bardasht

 

2004

ग़ालिब बोतीक़ा

अशआर-ए-ग़ालिब की तफ़्हीम

2003

Ghalib Ki Taba-e-Nukta Joo

 

2000

Goongi Nazmein

 

1987

Meer Anees Ki Shairana Baseerat

 

2003

Meer-e-Balanosh

 

2001

Meer-e-Balanosh

 

2001

Mutala-e-Dabeer

 

2003

 

"लाहौर" के और शायर

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