Mazhar Mirza Jaan-e-Janaan's Photo'

मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ

1699 - 1781 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 5

 

शेर 7

ख़ुदा के वास्ते इस को टोको

यही इक शहर में क़ातिल रहा है

जो तू ने की सो दुश्मन भी नहीं दुश्मन से करता है

ग़लत था जानते थे तुझ को जो हम मेहरबाँ अपना

रुस्वा अगर करना था आलम में यूँ मुझे

ऐसी निगाह-ए-नाज़ से देखा था क्यूँ मुझे

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ई-पुस्तक 5

Makateeb-e-Mirza Mazhar Janjana

 

1995

मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ

उन का अह्द और उर्दू शाइरी

1988

Mirza Mazhar Jan-e-Janan Aur Unka Kalam

 

1961

Mirza Mazhar Jan-e-janan Ke Khutoot

 

1962

 

चित्र शायरी 2

चली अब गुल के हाथों से लुटा कर कारवाँ अपना न छोड़ा हाए बुलबुल ने चमन में कुछ निशाँ अपना ये हसरत रह गई क्या क्या मज़े से ज़िंदगी करते अगर होता चमन अपना गुल अपना बाग़बाँ अपना अलम से याँ तलक रोईं कि आख़िर हो गईं रुस्वा डुबाया हाए आँखों ने मिज़ा का ख़ानदाँ अपना रक़ीबाँ की न कुछ तक़्सीर साबित है न ख़ूबाँ की मुझे नाहक़ सताता है ये इश्क़-ए-बद-गुमाँ अपना मिरा जी जलता है उस बुलबुल-ए-बेकस की ग़ुर्बत पर कि जिन ने आसरे पर गुल के छोड़ा आशियाँ अपना जो तू ने की सो दुश्मन भी नहीं दुश्मन से करता है ग़लत था जानते थे तुझ को जो हम मेहरबाँ अपना कोई आज़ुर्दा करता है सजन अपने को हे ज़ालिम कि दौलत-ख़्वाह अपना 'मज़हर' अपना 'जान-ए-जाँ' अपना

 

ऑडियो 5

उस गुल को भेजना है मुझे ख़त सबा के हाथ

चली अब गुल के हाथों से लुटा कर कारवाँ अपना

तजल्ली गर तिरी पस्त ओ बुलंद उन को न दिखलाती

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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