मीर सय्यद मुज़फ्फर अली ज़फ़र मुज़ाहरी
ग़ज़ल 4
अशआर 1
तकसीरियत का हामिल जम्हूरियत का हामिल
अज़्मत-निशाँ सरासर हिन्दोस्ताँ हमारा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere