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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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महर अकबराबादी

1916 - 1989

महर अकबराबादी

अशआर 1

मंज़िल की सम्त कब से सफ़र कर रहे हैं हम

लेकिन जो फ़ासले थे वो अब तक कम हुए

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