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मिद्हत-उल-अख़्तर

1945 | औरंगाबाद, भारत

मिद्हत-उल-अख़्तर

ग़ज़ल 24

शेर 12

लाई है कहाँ मुझ को तबीअत की दो-रंगी

दुनिया का तलबगार भी दुनिया से ख़फ़ा भी

तुम मिल गए तो कोई गिला अब नहीं रहा

मैं अपनी ज़िंदगी से ख़फ़ा अब नहीं रहा

जाने वाले मुझे कुछ अपनी निशानी दे जा

रूह प्यासी रहे आँख में पानी दे जा

आँखें हैं मगर ख़्वाब से महरूम हैं 'मिदहत'

तस्वीर का रिश्ता नहीं रंगों से ज़रा भी

जिस्म उस की गोद में हो रूह तेरे रू-ब-रू

फ़ाहिशा के गर्म बिस्तर पर रिया-कारी करूँ

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पुस्तकें 3

Charon Or

 

1968

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2004

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1980

 

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