मिर्ज़ा महमुद सरहदी
ग़ज़ल 1
नज़्म 1
अशआर 1
नमी सी थी दम-ए-रुख़्सत कुछ उन के आँचल पर
वो अश्क थे कि पसीना मैं सोचता ही रहा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere