मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
ग़ज़ल 23
अशआर 21
सब हम-सफ़ीर छोड़ के तन्हा चले गए
कुंज-ए-क़फ़स में मुझ को गिरफ़्तार देख कर
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क्या मज़ा हो जो किसी से तुझे उल्फ़त हो जाए
जंगलों में जुस्तुजू-ए-क़ैस-ए-सहराई करूँ
जवानी याद हम को अपनी फिर बे-इख़्तियार आई
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