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मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

1766 - 1836 | लखनऊ, भारत

अवध के नवाब, आसिफ-उद-दौला के ममेरे भाई, कई शायरों के संरक्षक

अवध के नवाब, आसिफ-उद-दौला के ममेरे भाई, कई शायरों के संरक्षक

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

ग़ज़ल 22

शेर 19

लुत्फ़-ए-शब-ए-मह दिल उस दम मुझे हासिल हो

इक चाँद बग़ल में हो इक चाँद मुक़ाबिल हो

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या ख़फ़ा होते थे हम तो मिन्नतें करते थे आप

या ख़फ़ा हैं हम से वो और हम मना सकते नहीं

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दिल में इक इज़्तिराब बाक़ी है

ये निशान-ए-शबाब बाक़ी है

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तेज़ रखियो सर-ए-हर-ख़ार को दश्त-ए-जुनूँ

शायद जाए कोई आबला-पा मेरे बाद

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माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले

हम खींच वहीं क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन निकले

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पुस्तकें 5

Deewan-e-Hawas

 

 

Intekhab-e-Kalam-e-Hawas

 

1983

Intikhab Deewan-e-Hawas

 

 

इंतिख़ाब-ए-कलाम-ए-हवस

 

1983

Mukhtar Ashaar

Volume-001

1896

 

ऑडियो 5

क्या मज़ा हो जो किसी से तुझे उल्फ़त हो जाए

जंगलों में जुस्तुजू-ए-क़ैस-ए-सहराई करूँ

जवानी याद हम को अपनी फिर बे-इख़्तियार आई

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

"लखनऊ" के और शायर

  • मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
  • जुरअत क़लंदर बख़्श जुरअत क़लंदर बख़्श
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  • वज़ीर अली सबा लखनवी वज़ीर अली सबा लखनवी
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  • यगाना चंगेज़ी यगाना चंगेज़ी