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मोहम्मद मुख़तार अली

मोहम्मद मुख़तार अली

ग़ज़ल 1

 

शेर 2

मियाँ ये चादर-ए-शोहरत तुम अपने पास रखो

कि इस से पाँव जो ढाँपें तो सर निकलता है

दिलों से दर्द दुआ से असर निकलता है

ये किस बहिश्त की जानिब बशर निकलता है