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मोहसिन ज़ैदी

1935 - 2003 | लखनऊ, भारत

बहराइच में जन्मे जाने माने प्रगतिशील शयर / फ़िराक़ के शागिर्द

बहराइच में जन्मे जाने माने प्रगतिशील शयर / फ़िराक़ के शागिर्द

ग़ज़ल 33

शेर 13

जैसे दो मुल्कों को इक सरहद अलग करती हुई

वक़्त ने ख़त ऐसा खींचा मेरे उस के दरमियाँ

कोई कश्ती में तन्हा जा रहा है

किसी के साथ दरिया जा रहा है

कोई अकेला तो मैं सादगी-पसंद था

पसंद उस ने भी रंगों में रंग सादा किया

ई-पुस्तक 7

Baab-e-Sukhan

 

2000

Jumbish-e-Nok-e-Qalam

 

2005

Kulliyat-e-Mohsin Zaidi

 

2014

Mataa-e-Aakhir-e-Shab

 

1990

रिश्ता-ए-कलाम

 

1978

Rishta-e-Kalam

 

1978

Shahr-e-Dil

 

1961

 

चित्र शायरी 1

हमें तो ख़ैर कोई दूसरा अच्छा नहीं लगता उन्हें ख़ुद भी कोई अपने सिवा अच्छा नहीं लगता नहीं गर नग़्मा-ए-शादी नफ़ीर-ए-ग़म सही कोई कि साज़-ए-ज़िंदगानी बे-सदा अच्छा नहीं लगता हमें ये बंद कमरों का मकाँ कुछ भा गया इतना कि हम को अब कोई आँगन खुला अच्छा नहीं लगता कुछ इतनी तल्ख़ उस दिन हो गई थी गुफ़्तुगू उन से कई दिन से ज़बाँ का ज़ाइक़ा अच्छा नहीं लगता कभी नज़दीक आ कर रू-ब-रू भी हों मुलाक़ातें कि हम-सायों में इतना फ़ासला अच्छा नहीं लगता कठिन रस्तों पे चलना अपनी उफ़्ताद-ए-तबीअत है हमें आसान कोई रास्ता अच्छा नहीं लगता इसे हम मर्सिया-गोयों पे 'मोहसिन' छोड़ देते हैं लिखें हम आप अपना मर्सिया अच्छा नहीं लगता

 

ऑडियो 10

अगर चमन का कोई दर खुला भी मेरे लिए

कोई कश्ती में तन्हा जा रहा है

कोई दीवार न दर जानते हैं

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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